देख लो ख्वाब मगर ख्वाब का चर्चा न करो...
लोग जल जायेंगे सूरज की तम्मना न करो....
वक्त का क्या है किसी भी पल बदल सकता है...
हो सके तुमसे तो तुम मुझ पे भरोसा न करो...
किरचीयां टूटे हुए अक्स की चुभ जायेंगी ...
और कुछ रोज़ अभी आईना देखा न करो....
अजनबी लगने लगे ख़ुद तुम्हे अपना ही वजूद...
अपने दिन रात को इतना भी अकेला न करो...
ख्वाब बच्चो के खीलौनो की तरह होते है...
ख्वाब देखा न करो , ख्वाब देखा न करो.....
बेखयाली में कभी उँगलियाँ जल जायेंगी...
राख गुज़रे हुए लम्हों की कुरेदा न करो....
मोम के रिश्ते है गर्मी से पिघल जायेंगे....
धुप से सहर में "आजार "ये तमाशा न करो....
----------------कफील आजार------
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
2 comments:
मोम के रिश्ते है गर्मी से पिघल जायेंगे....
धुप से सहर में "आजार "ये तमाशा न करो....
बहुत अच्छा।
वक्त का क्या है किसी भी पल बदल सकता है...
हो सके तुमसे तो तुम मुझ पे भरोसा न करो...
किरचीयां टूटे हुए अक्स की चुभ जायेंगी ...
और कुछ रोज़ अभी आईना देखा न करो....
वाह बेहतरीन ग़ज़ल ..
Post a Comment