दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं,
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैं....
इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशन ,
मेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं...
रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो ,
सु -ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं....
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग,
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं....
और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो,
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं ......
Sunday, July 27, 2008
तड़पते दिल को सुकून का पता मिले न मिले...
तुम्हारे दर्द से बेहतर दवा मिले न मिले...
मेरे गुनाह के मुझको सजा मिलेगी जरुर...
मेरी वफाओ का मुझको सिला मिला न मिले.....
मेरे गुनाह में शामिल मेरा जमीर भी था....
ये और बात है की उसको सजा मिले न मिले....
तुम अपने हाथ का पत्थर यंही पे खर्च करो....
फ़िर इसके बाद तुम्हे आईना मिले न मिले....
चलो हम आज ये किस्सा यंही पे ख़त्म करे...
की ख़ुद उलझ के भी मुझको सिरा मिले न मिले....
तुम्हारे दर्द से बेहतर दवा मिले न मिले...
मेरे गुनाह के मुझको सजा मिलेगी जरुर...
मेरी वफाओ का मुझको सिला मिला न मिले.....
मेरे गुनाह में शामिल मेरा जमीर भी था....
ये और बात है की उसको सजा मिले न मिले....
तुम अपने हाथ का पत्थर यंही पे खर्च करो....
फ़िर इसके बाद तुम्हे आईना मिले न मिले....
चलो हम आज ये किस्सा यंही पे ख़त्म करे...
की ख़ुद उलझ के भी मुझको सिरा मिले न मिले....
Tuesday, July 22, 2008
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी,
कुछ अधुरे सपने ,मेरी मुश्किलें ,मेरी कठनाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
मेरे भावनाओं से खेला मेरे ऊसुलों का दाम लगा के,
बेबसी हँस रही थी मुझ पर कायरता का इल्जाम लगा के,
चुप था मैं पर लड़ रही सबसे मेरी परछाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
समय ने कर के तीमिर से मंत्रणा,हर ज्योति को बुझा दिया,
स्वाभीमान के कर के टुकड़े-टुकड़े मझे घूटनों में ला दिया,
हर तरफ़ से मिल रही बस जग हँसाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
जब देखा स्वयं को आईने में ,मैं टूट चूका था हर मायने में,
स्थिल कर रहा सोंच को ये बिन आग का कैसा धुआँ है,
ध्यान से देखा ,ओह ये आइना टूटा हुआ है,
और यही सोंच बन के जीत लेने लगी अँगड़ाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी
कुछ अधुरे सपने ,मेरी मुश्किलें ,मेरी कठनाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
मेरे भावनाओं से खेला मेरे ऊसुलों का दाम लगा के,
बेबसी हँस रही थी मुझ पर कायरता का इल्जाम लगा के,
चुप था मैं पर लड़ रही सबसे मेरी परछाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
समय ने कर के तीमिर से मंत्रणा,हर ज्योति को बुझा दिया,
स्वाभीमान के कर के टुकड़े-टुकड़े मझे घूटनों में ला दिया,
हर तरफ़ से मिल रही बस जग हँसाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
जब देखा स्वयं को आईने में ,मैं टूट चूका था हर मायने में,
स्थिल कर रहा सोंच को ये बिन आग का कैसा धुआँ है,
ध्यान से देखा ,ओह ये आइना टूटा हुआ है,
और यही सोंच बन के जीत लेने लगी अँगड़ाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी
ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया...
जाने क्यों तेरे अंजाम पे रोना आया....
यू तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है...
आज कुछ बात है जो इस शाम पे रोना आया...
कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंजिल -ऐ- इश्क पे हर गम पे रोना आया....
जब हुआ ज़माने में जिक्र मुहब्बत का "शकील"
मुझे को अपने दिल-ऐ-नाकाम पे रोना आया....
----शकील बदायुनी
जाने क्यों तेरे अंजाम पे रोना आया....
यू तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है...
आज कुछ बात है जो इस शाम पे रोना आया...
कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंजिल -ऐ- इश्क पे हर गम पे रोना आया....
जब हुआ ज़माने में जिक्र मुहब्बत का "शकील"
मुझे को अपने दिल-ऐ-नाकाम पे रोना आया....
----शकील बदायुनी
Sunday, July 6, 2008
तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा
गुज़र ही आये किसी तरह तेरे दीवाने, क़दम क़ादम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा
चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी , तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा
मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में , बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा
ये और बात कि हर छेड़ लाउबाली थी , तेरी नज़र का दिलों से मुआमला तो रहा
बहुत हसीं सही वज़ए-एहतियात तेरी , मेरी हवस को तेरे प्यार से गिला तो रहा
मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊं
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं
कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर
ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं
सोचता हूं तो छलक उठती हैं मेरी आँखें
तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊं
चारागर तेरी महारथ पे यक़ीं है लेकिन
क्या ज़ुरूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊं ?
बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊं
शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊं
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं
कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर
ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं
सोचता हूं तो छलक उठती हैं मेरी आँखें
तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊं
चारागर तेरी महारथ पे यक़ीं है लेकिन
क्या ज़ुरूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊं ?
बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊं
शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊं
Subscribe to:
Posts (Atom)