Wednesday, December 3, 2008
कुछ न कुछ हमने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो...
कू-ए-क़ातिल की बड़ी धूम है चलकर देखें...
क्या ख़बर, कूचा-ए-दिलदार से प्यारा ही न हो...
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी...
चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो...
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर...
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो....
ज़िन्दगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको...
दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न ‘हो.....
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ...
न मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो ...
गम के साये साथ में लाते है....
हम जितना भी चाहे आईने के सामने मुस्कुराना....
न जाने आंसू कंहा से आँखों में भर आते है....
अपने दुनिया को आज भी ख्वाबों से सजाते है....
आँखे खुलते ही ये सब भी टूट जाते है....
जानते है न सच होगा अब कोई सपना हमारा....
फ़िर भी आँखों में ओ सुनहरे सपने सजाते है....
करते है राज़ की बात..... मैं और मेरी तन्हाई.....
दिन तो गुज़र ही जाता है लोगो की भीड़ में....
करते है बसर रात.... मैं और मेरी तन्हाई....
सांसो का क्या भरोसा कब छोड़ जाए साथ....
लेकिन रहेंगे साथ.... मैं और मेरी तन्हाई.....
आए न तुम्हे याद कभी भूल कर भी हम...
करते है तुम्हे याद.... मैं और मेरी तन्हाई.....
आ के पास क्यूँ दूर हो गए हमसे....
करते है तेरी तलाश.... मैं और मेरी तन्हाई....
कल रात जाने क्या हुआ....
कुछ देर पहले नींद से....
कुछ अश्क मिलने आ गए....
कुछ ख्वाब भी टूटे हुए....
कुछ लोग भी रूठे हुए...
कुछ रास्ता भटकी हुई...
कुछ गर्द में लिपटी हुई ...
कुछ बेतरह फ़ैली हुई...
कुछ खोल में लिपटी हुई....
बे-रब्त सी सोचे कई...
भूली हुई बातें कई...
एक शख्स की यादें कई...
फ़िर देर तक जागा रहा....
सोच में गुम बैठा रहा....
ऊँगली से ठंढे फर्श पर...
एक नाम ही लिखता रहा....
कल रात भी ओ रात थी...
............................................
..............................................
मैं देर तक रोता रहा......
..........................................
कल रात जाने क्या हुआ.................................................
Tuesday, November 18, 2008
कि कोई हमे याद तो करता है,
बात न करे तो क्या हुआ,
कोई आज भी हम पर कुछ लम्हे बरबाद तो करता है.
ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,
हर बात समझाने के लिए नही होती,
याद तो अक्सर आती है आप की,
लकिन हर याद जताने के लिए नही होती.
महफिल न सही तन्हाई तो मिलती है,
मिलन न सही जुदाई तो मिलती है,
कौन कहता है मोहब्बत में कुछ नही मिलता,
वफ़ा न सही बेवफाई तो मिलती है.
कितनी जल्दी ये मुलाक़ात गुज़र जाती है,
प्यास भुजती नही बरसात गुज़र जाती है,
अपनी यादों से कह दो कि यहाँ न आया करे,
नींद आती नही और रात गुज़र जाती है.
उमर की राह मे रस्ते बदल जाते हैं,
वक्त की आंधी में इन्सान बदल जाते हैं,
सोचते हैं तुम्हें इतना याद न करें,
लेकिन आंखें बंद करते ही इरादे बदल जाते हैं.
कभी कभी दिल उदास होता है,
हल्का हल्का सा आँखों को एहसास होता है,
छलकती है मेरी भी आँखों से नमी,
जब तुम्हारे दूर होने का एहसास होता है .
मुझको सँभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं...
पहले हक़ीक़तों ही से मतलब था, और अब...
एक-आध बात फ़र्ज़ भी करने लगा हूँ मैं...
हर आन टूटते ये अक़ीदों के सिलसिले...
लगता है जैसे आज बिखरने लगा हूँ मैं...
ऐ चश्म-ए-यार ! मेरा सुधरना मुहाल था...
तेरा कमाल है कि सुधरने लगा हूँ मैं...
ये मेहर-ओ-माह, अर्ज़-ओ-समा मुझमें खो गये...
इक कायनात बन के उभरने लगा हूँ मैं...
इतनों का प्यार मुझसे सँभाला न जायेग...
लोगो ! तुम्हारे प्यार से डरने लगा हूँ मैं...
दिल्ली ! कहाँ गयीं तिरे कूचों की रौनक़ें...
गलियों से सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं ...
Monday, October 27, 2008
हिस्से में मेरे ख्वाबों की सौगत न आयी ....
मौसम ही पे हम करते रहे तब्सरा ता देर....
दिल जिस से दुखे ऐसी कोई बात न आयी ....
यूं डोरे को हम वक्त की पकड़े तो हुए थे....
एक बार मगर छूटी तो फिर हाथ न आयी ....
हमराह कोई और न आया तो क्या गिला....
परछाई भी जब मेरी मेरे साथ न आयी ....
हर सिम्त नज़र आती हैं बेफ़सल ज़मीन....
इस साल भी शहर में बरसात न आयी ....
आँधी ने ये तिलिस्म भी रख डाला तोड़ के....
आग़ाज़ क्यों किया था सफ़र उन ख़्वाबों का
पछता रहे हो सब्ज़ ज़मीनों को छोड़ के....
इक बूँद ज़हर के लिये फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के....
कुछ भी नहीं जो ख़्वाब की तरह दिखाई दे
कोई नहीं जो हम को जगाये झिन्झोड़ के....
इन पानियों से कोई सलामत नहीं गया
है वक़्त अब भी कश्तियाँ ले जाओ मोड़ के....
Friday, October 24, 2008
कदम रखा कि मंज़िल रास्ता थी ....
कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है....
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी....
मोहब्बत मर गई मुझको भी ग़म है ...
मेरे अच्छे दिनों की आशना थी ....
जिसे छू लूँ मैं वो हो जाये सोना ....
तुझे देखा तो जाना बद्दुआ थी....
मरीज़े-ख़्वाब को तो अब शफ़ा है ...
मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी....
Sunday, October 12, 2008
होश इतना है की मैं तुझसे फरामोश नही...
मैं तेरी मस्त निगाहों का भरम रख लूंगा...
होश आया भी तो कह दूंगा मुझे होश नही....
याद इतना है की पंहुचा दर - ऐ-मैखाने तक...
क्या कहू आगे की आगे का मुझे होश नही.....
कभी उन मदभरी आँखों से पिया था इक जाम...
अज तक होश नही, होश नही, होश नही..........
Thursday, October 9, 2008
गुलों ने बेरुखी की है, काँटों ने सम्हाला है....
मुहब्बत में ख्याल -ऐ-साहिल-ओ - मंजिल है नादानी...
जो इन राहों में लुट जाए, ओ तक़दीरवाला हैं....
चरागाँ कर के दिल को बहला रहे हो जंहावालो...
अँधेरा लाख रोशन हो, उजाला फ़िर उजाला है...
किनारों से मुझे ये नाखुदा दूर ही रखना...
वंहा ले कर चलो, तूफ़ान जंहा से उठने वाला है....
नशेमन ही के लुट जाने का गम होता तो क्या गम था...
यंहा तो बेचने वालो ने गुलशन बेच डाला है.......
Sunday, October 5, 2008
कभी हम चोट खाते है कभी हम मुस्कुराते है....
हम अक्सर दोस्तों के बेवफाई सह तो लेते हैं....
मगर हम जानते है दिल हमारा टूट जाता हैं....
जब भी याद आती हैं तुम्हारे प्यार की बातें...
तब तब दिल हमारा दर्द से बेजार होता हैं....
किसी के साथ जब बीते हुए लम्हों की याद आई...
थकी आँखों में अश्को के सितारे झिलमिलाते हैं....
Monday, September 29, 2008
नम आँखों में भी प्यास है अभी....
दोस्तों से चुका रहा हूँ हिसाब...
दुश्मनों से कंहा ठानी है अभी...
दोस्त कह कर मुझे न दे गली...
दिल पे अभी ज़ख्म-ऐ-दोस्ती है अभी....
काट दे ये भी ख़ुदपरस्ती में ...
और थोडी सी जो ज़िन्दगी है अभी....
जाने क्यूँ कुंद हो गया नस्तर...
ज़ख्म की धार तो ओही है अभी.....
Saturday, September 27, 2008
ऐसी भी तो किसी से मुहब्बत कभी न हो...
वादा ज़रूर करते है आते कभी नही...
फ़िर ये भी चाहते है की शिकायत कभी न हो...
शाम-ऐ-वस्ल भी ये तगफ़्फ़ुल ये बेरुखी...
तेरी रज़ा हैं की मुझको मसर्रत कभी न हो....
दोस्तों ने दिया है मुझे किस तरह फरेब....
मुझ सा भी कोई सादा तबियत कोई नही....
लब तो ये कह रहे है की उठ बढ़ के चूम ले...
आँखों का ये इशारा की जुर्रत कभी न हो....
दिल चाहता है फ़िर ओही फुर्सत के रात दिन...
मुझको तो तेरे ख्याल से फुर्सत कभी न हो...
Thursday, September 25, 2008
किसी से तो की होगी तुमने मुहब्बत, किसी को गले से लगाया तो होगा...
तुम्हारे खयालो की विरानिओं में , मेरी याद के फूल महके तो होंगे....
कभी अपने आँखों के काज़ल से तुमने, मेरा नाम लिख कर मिटाया तो होगा....
लबो से मुहब्बत का जादू जगा कर , भरी बज्म से सब से नज़रें बचा कर...
निगाहों की राहों से दिल में समां कर, किसी ने तुम्हे भी चुराया तो होगा...
कभी आईने से निगाहें मिलाकर, जो ली होगी भरपूर अंगराई तुमने....
तो घबराकर ख़ुद तेरी अंगराईओं ने, तेरे हुस्न को गुदगुदाया तो होगा...
निगाहों में शमा-ऐ-तमन्ना जला कर, तकी होंगी तुमने भी राहें किसी की....
किसी ने तो वादा किया होगा तुमसे, किसी ने तुम्हे भी रुलाया तो होगा.....
लाख खिलौने तोड़ चुके हो एक खिलौना और सही....
रात है गम आज बुझा दो जलता हुआ हर एक चिराग...
दिल में अँधेरा हो ही चुका है घर में अँधेरा और सही....
दम है निकलता एक आशिक का भीड़ है आ कर देख तो लो...
लाख तमाशे देखेंगे होंगे एक नज़ारा और सही....
खंजर ले कर सोचते क्या हो अब तो कत्ल भी कर डालो....
दाग है सौ दमन पे तुम्हारे , एक इजाफा और सही......
Tuesday, September 23, 2008
अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाउंगा....
लेकर मेरा पता वक्त जाया न करो....
मैं तो बंजारा हूँ क्या जाने किधर जाउंगा....
इस तरफ़ धुंध है , जुगनू है, न चिराग कोई...
कौन पहचानेगा बस्ती में अगर जाउंगा...
जिंदगी मैं भी मुसाफिर हूँ तेरी कश्ती का...
तू जंहा मुझसे कहेगी मैं उतर जाउंगा.....
यंहा रह जायेंगी गुलदानों में बस यादो की नज़र...
मैं तो खुशबू हूँ फजाओं में बिखर जाउंगा.....
ये कैसे बेबसी है आज हम रो भी नही सकते....
ये कैसा दर्द है हमें पल पल तडपाये रखता है....
तुम्हारी याद आती है तो फ़िर सो भी नही सकते....
छुपा सकते है और न दिखा सकते है लोगों को....
कुछ ऐसा दाग है दिल पर जो हम धो भी नही सकते....
हमारा एक होना भी नही मुमकिन रहा अब तो....
जिए कैसे की तुमसे दूर रह भी नही सकते.....
मुहब्बत के लिए ये दिल नहीं है...
बड़ा ही ग़मज़दा बे आसरा है
जो कुछ भी हो मगर बुज़दिल नहीं है....
मुहब्बत में बला की चोट खाई
बहुत तड़पा है पर घायल नहीं है....
ये परछाई किसी हरजाई की है
मेरा साया तो ये बिल्कुल नहीं है....
मेरी आँखों से गुमसुम रोशनी है
मेरी नज़रों से वो ओझल नहीं है....
मुझे जो जान से है बढ़ के प्यारा
क्यों मेरे दर्द में शामिल नहीं है....
मुहब्बत चाँद से वो क्या करेगी
चकोरी जैसी जो पागल नहीं है
वक्त के हाथों या फिर हालात का मारा हुआ.....
कौन सुनता है किसी का दर्द इस माहौल मैं
हर किसी की आँख का पानी है अब खारा हुआ.....
शोरोगुल में दब के रह जाती हैं आवाज़ें सभी...
दम घुटा है सोज़ का और साज़ नाकारा हुआ....
दो बदन इक जान थे उड़ते रहे आकाश में
आए जब धरती पे दोनों उनका बँटवारा हुआ.....
रात भर जागा किए बिरहा की काली रात में
आई नींद गहरी जब था उजियारा हुआ......
Thursday, September 18, 2008
लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पे नही हूँ मैं....
इन्सान हूँ धरकते हुए दिल पे हाथ रख...
यूं डूबाके न देख , समंदर नही हूँ मैं.......
चेहरे पे मल रहा हूँ स्याही नसीब की....
आईना हाथ में है..सिकंदर नही हूँ मैं.....
ग़ालिब तेरी जमीं पे लिखी तो है ग़ज़ल....
तेरे कद-ऐ-सुखन के बराबर नही हूँ मैं......
Saturday, September 13, 2008
आ जा की ज़हर खाए ज़माने गुज़र गए...
ओ जाने वाले आ, की तेरे इंतजार में....
रास्ते को घर बनाये ज़माने गुज़र गए...
गम है ना अब खुशी है, न उम्मीद है न आस ....
सब से निजात पाए ज़माने गुज़र गए....
क्या लायक-ऐ-गम भी नही अब मैं दोस्तों...
पत्थर भी घर में आए ज़माने गुज़र गए....
जाने-बहार फूल नही आदमी हूँ मैं...
आ जा की मुस्कुराये ज़माने गुज़र गए.....
Saturday, September 6, 2008
तुम ने भी छोड़ दिया है मुझे दुनिया की तरह....
छोड़ के न जाओ यूं अहद-ऐ-गुजिस्ता की तरह...
बन के उम्मीद रहो कल के वादे की तरह....
तुम हवा हो तो बीखेरो मुझे साहिल साहिल....
मौज-ऐ-मय हो तो बहा दो मुझे दरिया के तरह....
पास रहते हो तो आता है जुदाई का ख्याल...
तुम मेरे दिल में हो अंदेशा-ऐ-फर्दा की तरह....
बीच में कुछ तो राह-ओ-रस्म-ऐ-ताल्लुकात रखो...
अजनबी यूं नही मिलते है भरोशेमा की तरह....
लोग जल जायेंगे सूरज की तम्मना न करो....
वक्त का क्या है किसी भी पल बदल सकता है...
हो सके तुमसे तो तुम मुझ पे भरोसा न करो...
किरचीयां टूटे हुए अक्स की चुभ जायेंगी ...
और कुछ रोज़ अभी आईना देखा न करो....
अजनबी लगने लगे ख़ुद तुम्हे अपना ही वजूद...
अपने दिन रात को इतना भी अकेला न करो...
ख्वाब बच्चो के खीलौनो की तरह होते है...
ख्वाब देखा न करो , ख्वाब देखा न करो.....
बेखयाली में कभी उँगलियाँ जल जायेंगी...
राख गुज़रे हुए लम्हों की कुरेदा न करो....
मोम के रिश्ते है गर्मी से पिघल जायेंगे....
धुप से सहर में "आजार "ये तमाशा न करो....
----------------कफील आजार------
Wednesday, September 3, 2008
कज़ा से आँख लड़ी है ज़रा ठहर जाओ....
थकी थकी से फजा बुझे बुझे तारे...
बड़ी उदास घड़ी है ज़रा ठहर जाओ...
नही उम्मीद की हम आज सहर देखेंगे...
ये रात हम पे खड़ी है ज़रा ठहर जाओ...
अभी न जाओ की तारो का दिल धड़कता है ...
तमाम रात पड़ी है ज़रा ठहर जाओ...
फ़िर इसके बाद कभी हम तुमको रोकेंगे...
लबो पे साँस रुकी है ज़रा ठहर जाओ....
दम-ऐ-फिराक में जी भर के तुम्हे देख तो लूँ...
ये फैसले की घड़ी है ज़रा ठहर जाओ.....
शर्मिंदा अब तुम्हे शरेबाज़ार क्यूँ करू.....
मालूम है की पार खुला आसमान है....
छुटते नही ये दरो-दीवार क्या करूँ.....
इस हाल में भी साँस लिया जा रहा हूँ मैं...
जाता नही है आस का आजार क्या करूँ....
फ़िर एक बार ओ रुख -ऐ- मासूम दिखाता....
खुलता नही है ये चस्म-ऐ-गुनाहगार क्या करूँ....
ये पुर सुकून सुबह ये मैं... ये फजा का सरुर...
वो सो रहे है अब उन्हें बेदार क्या करूँ....
Saturday, August 30, 2008
Wednesday, August 20, 2008
हम अपने दर्द को ग़ज़लों में ढाल देते हैं
हमारी नींदों में अक्सर जो डालती हैं ख़लल
हम ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमे
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं
कमाल ये है वो गोहरशनास हैं ही नहीं
जो इक नज़र में समंदर खंगाल देते है
वो सारे हादसे हिम्मत बढ़ा गए मेरी
कि जिनके साये ही दम—ख़म पिघाल देते हैं
ज़िन्दगी के नाम पर धिक्कार हो जाते हैं लोग
सत्य और ईमान के हिस्से में हैं गुमनामियाँ
साज़िशें बुन कर मगर अवतार हो जाते हैं लोग
बेच देते हैं सरे—बाज़ार वो जिस्मो—ज़मीर
भूख से जब भी कभी लाचार हो जाते हैं लोग
रात भर मशगूल रहते हैं अँधेरों में कहीं
और अगली सुबह का अखबार हो जाते हैं लोग
फिर कबीलों का न जाने हश्र क्या होगा, जहाँ
नोंक पर बंदूक की सरदार हो जाते हैं लोग
मतलबों की भीड़ जब—जब कुलबुलाती है यहाँ
हमने देखा है बड़े मक़्क़ार हो जाते हैं लोग
साहिलों पर बैठ तन्हा भला क्या इन्तज़ार
आज हैं इस पार कल उस पार हो जाते हैं लोग
कि जब ज़मीर मुझे रास्ता दिखाता था
मशीन बन तो चुका हूँ मगर नहीं भूला
कि मेरे जिस्म में दिल भी कभी धड़कता था
वो बच्चा खो गया दुनिया की भीड़ में कब का
हसीन ख़्वाबों की जो तितलियाँ पकड़ता था
मेरा वजूद भी शामिल था उसकी मिट्टी में
मेरा भी खेत की फ़स्लों में कोई हिस्सा था
हमारी ज़िन्दगी थी इक तलाश पानी की
जहान रेत का इक चमकता दरिया था
साया दिवार पे मेरा था, सदा किसकी थी...........
उसकी रफ्तार से लिपटी रही मेरी आँखे,
उस ने मुड़ कर भी न देखा की वफ़ा किसकी थी...
वक्त के तरह दबे पाँव ये कौन आया है,
मैंने अँधेरा जिसे समझा , ओ कबा किसकी थी...
आंसू से ही सही भर गया दामन मेरा,
हाथ तो मैंने उठाये थे,दुआ किसकी थी..........
मेरे आहों की जबान कोई समझता कैसे,
जिंदगी इतनी दुखी मेरे सिवा किसकी थी......
आग से दोस्ती उसकी थी, जला घर मेरा,
दी गयी किसको सज़ा और खता किसकी थी......
Monday, August 18, 2008
हमको खुश रहने के आदाब कंहा आते है....
मैं तो एकमुश्त उसे सौंप दू सब कुछ लेकिन,
एक मुट्ठी में मेरे ख्वाब कंहा आते है.....
मुद्दतो बाद तुम्हे देख के दिल भर आया,
वरना शहरो में सैलाब कंहा आते है.....
मेरी बेदार निगाहों में कंही भूले से,
नींद आए भी तो अब खवाब कंहा आते है.....
शिद्दते दर्द है या कसरत -ऐ-मैनोशी है,
होश में तेरे ये बेताब कंहा आते है....
हम किसी तरह तेरे दरवाज़े पे ठिकाना कर ले,
हम फकीरों को ये आदाब कंहा आते है.....
सर बसर जिन में फकत तेरी झलक मिलती थी,
अब मयस्सर हमें ओ खवाब कंहा आते है......
Sunday, August 17, 2008
ज़िन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नही...
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नही....
मेरे इन हाथो की चाहो तो तलाशी ले लो...
मेरे हाथो में लकीरों के सिवा कुछ भी नही...
हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यंहा.....
सामने जिनके ओ सचमुच का खुदा कुछ भी नही....
या खुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार....
ज़र्द ही ज़र्द है पेरो पे, हरा कुछ भी नही....
दिल भी जिद पे अडा है , किसी बच्चे की तरह...
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए , या कुछ भी नही....
जिंदगी, जैसी तम्मना थी , नही, कुछ कम है....
हर घड़ी होता है एहसास , कंही कुछ कम है...
घर की तामीर तस्सबुर में ही हो सकती है ...
अपने नक्से के मुताबिक ये ज़मीं कुछ कम है...
बिछडे लोगो से मुलाकात कभी फ़िर होगी...
दिल में उम्मीद तो काफी है , यकीं कम है....
अब जिधर देखीये लगता है की इस दुनिया में...
कंही कुछ चीज़ जियादा है , कंही कुछ कम है....
आज भी तेरी दुरी ही है उदासी का सबब....
ये अलग बात है की पहले से नही, अब कुछ कम है.....
Friday, August 15, 2008
रोग-सा इक ज़िंदगी को हो गया है।
अर्थ कुछ रखता नहीं तुम बिन ये जीवन,
फूल चुन कर कोई काँटे बो गया है।
आँख से टपका नहीं है कोई आँसू,
मन हज़ारों बार लेकिन रो गया है।
जाने कबसे मैं पुकारे जा रहा हूँ,
भाग्य मेरा लग रहा है सो गया है।
सभी चेहरे अपरिचित लगने लगे हैं,
शहर सारा अजनबी-सा हो गया है।
आस्माँ भी है शरीक़े-ग़म मेरा ,
आज धरती को बरस कर धो गया है।
तुम नज़र से दूर हो कुछ खो गया है,
रोग-सा इक ज़िंदगी को हो गया है।
Monday, August 11, 2008
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है...
एक चिंगारी कंही से ढूंढ लाओ दोस्तों...
इस दिए में तेल से भींगी हुई बाती तो है...
एक खंडहर के ह्रदय सी, एक जंगली फूल सी....
आदमी के पीर गूंगी ही सही गाती तो है....
एक चादर रात ने सारे नगर पे ड़ाल दी ...
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है...
निर्वचन मैदान में लेटी हुई जो नदी है...
पत्थरो के ओट में , जा जा के बतियाती तो है...
दुःख नहीं कोई के अब उपलब्धियों के नाम पर...
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है....
Sunday, August 3, 2008
बहुत कड़ा है सफ़र... थोडी दूर साथ चलो.....
तमाम उम्र कंहा कोई साथ देता है....
मैं जनता हूँ मगर थोडी दूर साथ चलो.....
नशे में चूर हूं मैं भी... तुम्हे भी होश नहीं....
बडा मज़ा हो थोडी दूर गर साथ चलो....
अभी तो जाग रहे है चिराग राहों के....
अभी तो दूर है सहर .... थोडी दूर साथ चलो.....
Sunday, July 27, 2008
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैं....
इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशन ,
मेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं...
रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो ,
सु -ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं....
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग,
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं....
और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो,
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं ......
तुम्हारे दर्द से बेहतर दवा मिले न मिले...
मेरे गुनाह के मुझको सजा मिलेगी जरुर...
मेरी वफाओ का मुझको सिला मिला न मिले.....
मेरे गुनाह में शामिल मेरा जमीर भी था....
ये और बात है की उसको सजा मिले न मिले....
तुम अपने हाथ का पत्थर यंही पे खर्च करो....
फ़िर इसके बाद तुम्हे आईना मिले न मिले....
चलो हम आज ये किस्सा यंही पे ख़त्म करे...
की ख़ुद उलझ के भी मुझको सिरा मिले न मिले....
Tuesday, July 22, 2008
कुछ अधुरे सपने ,मेरी मुश्किलें ,मेरी कठनाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
मेरे भावनाओं से खेला मेरे ऊसुलों का दाम लगा के,
बेबसी हँस रही थी मुझ पर कायरता का इल्जाम लगा के,
चुप था मैं पर लड़ रही सबसे मेरी परछाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
समय ने कर के तीमिर से मंत्रणा,हर ज्योति को बुझा दिया,
स्वाभीमान के कर के टुकड़े-टुकड़े मझे घूटनों में ला दिया,
हर तरफ़ से मिल रही बस जग हँसाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
जब देखा स्वयं को आईने में ,मैं टूट चूका था हर मायने में,
स्थिल कर रहा सोंच को ये बिन आग का कैसा धुआँ है,
ध्यान से देखा ,ओह ये आइना टूटा हुआ है,
और यही सोंच बन के जीत लेने लगी अँगड़ाई थी,
मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी
जाने क्यों तेरे अंजाम पे रोना आया....
यू तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है...
आज कुछ बात है जो इस शाम पे रोना आया...
कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंजिल -ऐ- इश्क पे हर गम पे रोना आया....
जब हुआ ज़माने में जिक्र मुहब्बत का "शकील"
मुझे को अपने दिल-ऐ-नाकाम पे रोना आया....
----शकील बदायुनी
Sunday, July 6, 2008
तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा
गुज़र ही आये किसी तरह तेरे दीवाने, क़दम क़ादम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा
चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी , तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा
मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में , बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा
ये और बात कि हर छेड़ लाउबाली थी , तेरी नज़र का दिलों से मुआमला तो रहा
बहुत हसीं सही वज़ए-एहतियात तेरी , मेरी हवस को तेरे प्यार से गिला तो रहा
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं
कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर
ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं
सोचता हूं तो छलक उठती हैं मेरी आँखें
तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊं
चारागर तेरी महारथ पे यक़ीं है लेकिन
क्या ज़ुरूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊं ?
बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊं
शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊं
Saturday, June 28, 2008
ना जाने सब्र का धागा , कंहा पर टूट जाता है....
किसे हमराह कहते हो यंहा पर अपना साया भी....
कंही पर साथ चलता है .... कही पर छूट जाता है..........
गनीमत है नगरवालो, लूटेरो से लुटे हो तुम,
हमें तो गाँव में अक्सर दरोगा लूट जाता है.....
अजब शै है ये रिश्ते भी बहुत मजबूत लगते है...
ज़रा से भूल से लेकिन भरोसा टूट जाता है.....
Wednesday, June 25, 2008
हमजैसे नादानों को क्या और कैसे समझाएँगे लोग......
है नई आवाज़ धुन भी है नई तुम ही कहो...
उन पुराने गीतों को फिर किसलिए गाएँगे लोग...
नम तो होंगी आँखें मेरे दुश्मनों की भी जरूर ....
जब -दिखावे को ही मातम करने आएँगे लोग.....
फेंकते हैं आज पत्थर जिस पे इक दिन देखना....
uska बुत चौराह पर खुद ही लगा जाएँगे लोग....
हादसों को यों हवा देते ही रहना है बजा....
देखकर धुआँ बुझाने आग को आएँगे लोग....
हमको कुछ कहना पड़ा है आज मजबूरी में यों....
डर था मेरी चुप से भी तो और घबराएँगे लोग.....
इतनी पैनी बातें मत कह अपनी ग़ज़लों में ऐ दोस्त....
हो के ज़ख्मी देखना बल साँप-से खाएँगे लोग....
कौन है अश्कों को सौदागर यहाँ पर दोस्तों....
देखकर तुमको दुखी, दिल अपना बहलाएँगे लोग.....
है बड़ी बेढब रिवायत इस नगर की .....
पहले देंगे ज़ख्म और फिर इनको सहलाएँगे लोग......
तेरे सिरहाने याद भी मेरीरात भर शम्मां-सी जली होगी
जिससे निकला है आफ़ताब मेरावो तेरा घर तेरी गली होगी
दोस्तों को पता चला होगादुश्मनों-सी ही खलबली होगी
सबने तारीफ़ तेरी की होगीमैं चुप रहा तो ये कमी होगी
तेरी आँखो में झाँकने के बादलड़खड़ाऊँ तो मयक़शी होगी
है तेरा ज़िक्र तो यकीं है मुझेमेरे बारें में बात भी होगी
जीत किस को भेंट कर दूँ
कोई तो अपना नहीं था
एक तुम थे, अब नही हो!
किस तरह राहत बनेगी
टूट जाने की हताशा
थक गई साँसों को देगा
कौन जीवन की दिलासा
बिस्तरों पर सिलवटें अब
नींद क्या, बस करवटें अब
रात ने ताने दिए तो
आँख में बस बात ये की
कोई तो सपना नहीं था
एक तुम थे, अब नहीं हो!
किस हथेली की रेखाओं
का वरण मैंने किया है
किसका , क्षण भर प्यार पाने
को जनम मैंने लिया है
इस प्रश्न का हल मिला कला
हाँ वही रीता हुआ पल
जिसने मेरा गीत सादा
जो कहो, रत्ना या राधा
कोई तो इतना नहीं था
एक तुम थे, अब नहीं हो!
Saturday, May 24, 2008
चराग़ों की तरह आँखें जलें, जब शाम हो जाए ।
मैं ख़ुद भी अहतियातन, उस गली से कम गुजरता हूँ,
कोई मासूम क्यों मेरे लिए, बदनाम हो जाए ।
अजब हालात थे, यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर,
मुहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए ।
समन्दर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको,
हवायें तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए ।
मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा,
परिंदा आस्माँ छूने में जब नाकाम हो जाए ।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में, ज़िंदगी की शाम हो जाए
Friday, May 9, 2008
Friday, April 18, 2008
Tuesday, April 8, 2008
मेरे अपने मेरे होने की निशानी मांगे...
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे.....
मैं भटकता ही रहा....दर्द के वीराने में....
वक़्त लिखता रहा...
चेहरे पे हर इक पल का हिसाब...
मेरी शोहरत मेरी दीवानगी की नज़र हुई ....
पी गयी मय की बोतल ... मेरे गीतों की किताब...
आज लौटा हूं तो हँसने की अदा भूल गया...
ये शहर भुला मुझे मैं भी इसे भूल गया....
मेरी अपने मेरे होने की निशानी मांगे...
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे.....
मेरा फन फिर मुझे बाज़ार में ले आया है...
ये ओ जाँ है की जंहा माहरो वफ़ा बिकते है...
बाप बिकते है और लखत-ए-जिगर बिकते है...
कोख बिकती है दिल बिकते है सिर बिकते है...
इस बदलती दुनिया का खुदा कोई नहीं....
सस्ते दामो में हर रोज़ खुदा बिकते है....बिकते है...
मेरी अपने मेरे होने की निशानी मांगे...
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे.....
खुद को कंही रख के भूल जाना चाहता हूं...
मेरे नसीब की खुशिया कब मिली मुझको...
बस एक बार उम्र भर के आंसू बहाना चाहता हूं....
ना जाने कितनी मुहब्बत है रंन्ज-ओ-गम से मुझे...
कोई भी दर्द हो दिल में छुपाना चाहता हूं...
बहा बहा के आंसू बिखर चूका हूं बहुत....
सिमट के अब जरा मुस्कुराना चाहता हूं....
जिसे एक उम्र दिल में छुपा के रखा है....
ओ राज अब सब को बताना चाहता हूं....
वोही है याद जो अछा कहा है लोगो ने...
बाकि सब भूल जाना चाहता हूं....
मुझे ज़माने ने पत्थर समझ लिया है मगर....
मैं एक लड़का हूं सबको बताना चाहता हूं....
मुझ से जो रूठ चुकी है ज़माने की खुशियाँ...
तो उन खुशियों से मैं भी रूठ जाना चाहता हूं......
Sunday, February 3, 2008
डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन परवो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिनबहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी काअगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले
मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवायेहुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले
हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामीफिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले
हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने कीवो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले
मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने काउसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले
जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकलेजो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले
खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिमकहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले
कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले
--चश्म-ऐ-तर - wet eyesखुल्द - Paradiseकूचे - streetकामत - statureदराजी - lengthतुर्रा - ornamental tassel worn in the turbanपेच-ओ-खम - curls in the hairमनसूब - associationबादा-आशामी - having to do with drinksतव्वको - expectationखस्तगी - injuryखस्ता - broken/sick/injuredतेग - swordसितम - cruelityक़ाबे - House Of Allah In Meccaवाइज़ - preacher
Sunday, January 20, 2008
His house is in the village though;
He will not see me stopping here
To watch his woods fill up with snow.
My little horse must think it queer
To stop without a farmhouse near
Between the woods and frozen lake
The darkest evening of the year.
He gives his harness bells a shake
To ask if there is some mistake.
The only other sound's the sweep
Of easy wind and downy flake.
The woods are lovely, dark and deep.
But I have promises to keep,
And miles to go before I sleep,
And miles to go before I sleep.....................
Friday, January 18, 2008
लोक धूमिल रँग दिया अनुराग से,
मौन जीवन भर दिया मधु राग से,
दे दिया संसार सोने का सहज
जो मिला करता बड़े ही भाग से,
कौन तुम मधुमास-सी अमराइयाँ महका गयी हो!
वीथीयँ सूने हृदय की घूम कर,
नव-किरन-सी डाल बाहें झूम कर,
स्वप्न-छलना से प्रवंचित प्राण की
चेतना मेरी जगायी चूम कर,
कौन तुम नभ-अप्सरा-सी इस तरह बहका गयी हो!
रिक्त उन्मन उर-सरोवर भर दिया
भावना-संवेदना को स्वर दिया,
कामनाओं के चमकते नव शिखर
प्यार मेरा सत्य शिव सुन्दर किया,
कौन तुम अवदात री!
इतनी अधिक जो भा गयी हो!
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अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है
एक हल्का सा धुंधलका था, कंही कम हो चला है.
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करू आकाश की मनुहार .......
अब तो पथ यही है ....
क्या भरोसा कांच का घाट है, किसी दिन फूट जाये .
एक मामूली कहानी है अधूरी छूट जाये,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाये .
आज हर नक्षत्र है अनुदार ,
अब तो पथ यही है .......
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है.
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढी है,
यह पहाडी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढी है ,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है.........
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