Monday, October 31, 2011

दिल ने तन्हाई के लम्हात चुगे थे दिन भर
और आँखों में मेरी अश्क छुपे थे दिन भर

मौलवी थे वो तपस्या में रहे थे दिन भर
उनकी चौखट पे कई लोग रुके थे दिन भर

प्यार इस शहर में इक शख्स था कल बाँट रहा
उस के क़दमों में बहुत लोग गिरे थे दिन भर

शब की आगोश में बेसुध से पड़े जिस लम्हा
सिर्फ इस बात पे खुश थे कि चले थे दिन भर

कोई सीने से लगा और कोई बेगानावार
थी तसल्ली कि कुछ अफराद मिले थे दिन भर

जश्न तो आया मगर दिल को दरीदः कर के
सब इसी बात पे अफ़सोस किये थे दिन भर

उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर

हम सुखनवर तो नहीं थे कोई ग़ालिब जैसे
बस खयालात ही कागज़ पे लिखे थे दिन भर

कदम भटके हुए हों तो उन्हें मंज़िल दिखाता चल,
लकीरें खींच कर उस राह का नक्शा बनाता चल।

किसी अनजान राही का सफ़र आसान करने को,
बतायें दूरियाँ वे मील के पत्थर लगाता चल।

यही मंदिर समझ अपना यही मस्जिद समझ अपनी,
गरीबों बेसहारों को दुआ थोड़ी मनाता चल।

तुम्हारी देह से हर वक्त सौंधी गंध आयेगी,
तनिक इस गाँव की मिट्टी से उबटन कर नहाता चल।

छनकते छंद उतरेंगे खनकते गीत आयेंगे,
पिरोकर शब्द उनमें दर्द के घुँघरू सजाता चल।

उठा दी है घृणा की जिस जगह दीवार आँगन में
ढहा कर अब उसे कुछ प्रेम के पौधे उगाता चल।

यहाँ बैठे हुए जो लोग युग से घुप अंधेरे में,
गुज़रते वक्त में ये दोस्त इक दीपक जलाता चल।

Saturday, May 7, 2011

क्या मिला है, क्या मिलेगा अश्क के व्यापार से
हर घड़ी जी लो मुहब्बत से,खुशी से,प्यार से

जीतने के सब तरीके सीख कर मैं जब लड़ा,
ज़िन्दगी ने इक सबक सिखला दिया है हार से

हम किताबे ज़िन्दगी के उस वरक को क्या पढ़े,
जो शुरू हो प्यार से औ' ख़त्म हो तकरार से

सरहदों से बाँट कर जब खाहिशों के दिन ढलें,
रात भर आवाज देता है कोई उस पार से

प्यार, खुशियाँ, दोस्ती अख़लाक़ ले आना ज़रा,
मोल दे कर गर खरीदे जा सके बाज़ार से

आपकी सोहबत ने हमको क्या हसीँ तोहफे दिए,
खाहिशें लाचार सी औ' खाब कुछ बेजार से