आग पुरी कंहा बुझी है अभी...
नम आँखों में भी प्यास है अभी....
दोस्तों से चुका रहा हूँ हिसाब...
दुश्मनों से कंहा ठानी है अभी...
दोस्त कह कर मुझे न दे गली...
दिल पे अभी ज़ख्म-ऐ-दोस्ती है अभी....
काट दे ये भी ख़ुदपरस्ती में ...
और थोडी सी जो ज़िन्दगी है अभी....
जाने क्यूँ कुंद हो गया नस्तर...
ज़ख्म की धार तो ओही है अभी.....
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