Saturday, September 27, 2008

क्या ये भी ज़िन्दगी है की रहत कभी ना हो...
ऐसी भी तो किसी से मुहब्बत कभी न हो...

वादा ज़रूर करते है आते कभी नही...
फ़िर ये भी चाहते है की शिकायत कभी न हो...

शाम-ऐ-वस्ल भी ये तगफ़्फ़ुल ये बेरुखी...
तेरी रज़ा हैं की मुझको मसर्रत कभी न हो....

दोस्तों ने दिया है मुझे किस तरह फरेब....
मुझ सा भी कोई सादा तबियत कोई नही....

लब तो ये कह रहे है की उठ बढ़ के चूम ले...
आँखों का ये इशारा की जुर्रत कभी न हो....

दिल चाहता है फ़िर ओही फुर्सत के रात दिन...
मुझको तो तेरे ख्याल से फुर्सत कभी न हो...

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