जो कुछ भी कहो .... कुबूल है तकरार क्यूँ करू.....
शर्मिंदा अब तुम्हे शरेबाज़ार क्यूँ करू.....
मालूम है की पार खुला आसमान है....
छुटते नही ये दरो-दीवार क्या करूँ.....
इस हाल में भी साँस लिया जा रहा हूँ मैं...
जाता नही है आस का आजार क्या करूँ....
फ़िर एक बार ओ रुख -ऐ- मासूम दिखाता....
खुलता नही है ये चस्म-ऐ-गुनाहगार क्या करूँ....
ये पुर सुकून सुबह ये मैं... ये फजा का सरुर...
वो सो रहे है अब उन्हें बेदार क्या करूँ....
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