Monday, September 29, 2008

आग पुरी कंहा बुझी है अभी...
नम आँखों में भी प्यास है अभी....

दोस्तों से चुका रहा हूँ हिसाब...
दुश्मनों से कंहा ठानी है अभी...

दोस्त कह कर मुझे न दे गली...
दिल पे अभी ज़ख्म-ऐ-दोस्ती है अभी....

काट दे ये भी ख़ुदपरस्ती में ...
और थोडी सी जो ज़िन्दगी है अभी....

जाने क्यूँ कुंद हो गया नस्तर...
ज़ख्म की धार तो ओही है अभी.....

Saturday, September 27, 2008

क्या ये भी ज़िन्दगी है की रहत कभी ना हो...
ऐसी भी तो किसी से मुहब्बत कभी न हो...

वादा ज़रूर करते है आते कभी नही...
फ़िर ये भी चाहते है की शिकायत कभी न हो...

शाम-ऐ-वस्ल भी ये तगफ़्फ़ुल ये बेरुखी...
तेरी रज़ा हैं की मुझको मसर्रत कभी न हो....

दोस्तों ने दिया है मुझे किस तरह फरेब....
मुझ सा भी कोई सादा तबियत कोई नही....

लब तो ये कह रहे है की उठ बढ़ के चूम ले...
आँखों का ये इशारा की जुर्रत कभी न हो....

दिल चाहता है फ़िर ओही फुर्सत के रात दिन...
मुझको तो तेरे ख्याल से फुर्सत कभी न हो...

Thursday, September 25, 2008

कोई चौंदहवी रात का चाँद बनकर , तुम्हारे तसव्वुर में आया तो होगा...
किसी से तो की होगी तुमने मुहब्बत, किसी को गले से लगाया तो होगा...

तुम्हारे खयालो की विरानिओं में , मेरी याद के फूल महके तो होंगे....
कभी अपने आँखों के काज़ल से तुमने, मेरा नाम लिख कर मिटाया तो होगा....

लबो से मुहब्बत का जादू जगा कर , भरी बज्म से सब से नज़रें बचा कर...
निगाहों की राहों से दिल में समां कर, किसी ने तुम्हे भी चुराया तो होगा...

कभी आईने से निगाहें मिलाकर, जो ली होगी भरपूर अंगराई तुमने....
तो घबराकर ख़ुद तेरी अंगराईओं ने, तेरे हुस्न को गुदगुदाया तो होगा...

निगाहों में शमा-ऐ-तमन्ना जला कर, तकी होंगी तुमने भी राहें किसी की....
किसी ने तो वादा किया होगा तुमसे, किसी ने तुम्हे भी रुलाया तो होगा.....
मेरा दिल भी शौक से तोड़ो एक तजुर्बा और सही...
लाख खिलौने तोड़ चुके हो एक खिलौना और सही....

रात है गम आज बुझा दो जलता हुआ हर एक चिराग...
दिल में अँधेरा हो ही चुका है घर में अँधेरा और सही....

दम है निकलता एक आशिक का भीड़ है आ कर देख तो लो...
लाख तमाशे देखेंगे होंगे एक नज़ारा और सही....

खंजर ले कर सोचते क्या हो अब तो कत्ल भी कर डालो....
दाग है सौ दमन पे तुम्हारे , एक इजाफा और सही......

Tuesday, September 23, 2008

इतना टुटा हूँ की छूने से बिखर जाउंगा.....
अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाउंगा....

लेकर मेरा पता वक्त जाया न करो....
मैं तो बंजारा हूँ क्या जाने किधर जाउंगा....

इस तरफ़ धुंध है , जुगनू है, न चिराग कोई...
कौन पहचानेगा बस्ती में अगर जाउंगा...

जिंदगी मैं भी मुसाफिर हूँ तेरी कश्ती का...
तू जंहा मुझसे कहेगी मैं उतर जाउंगा.....

यंहा रह जायेंगी गुलदानों में बस यादो की नज़र...
मैं तो खुशबू हूँ फजाओं में बिखर जाउंगा.....
ना तुझे छोड़ सकते है तेरे हो भी नही सकते....
ये कैसे बेबसी है आज हम रो भी नही सकते....

ये कैसा दर्द है हमें पल पल तडपाये रखता है....
तुम्हारी याद आती है तो फ़िर सो भी नही सकते....

छुपा सकते है और न दिखा सकते है लोगों को....
कुछ ऐसा दाग है दिल पर जो हम धो भी नही सकते....

हमारा एक होना भी नही मुमकिन रहा अब तो....
जिए कैसे की तुमसे दूर रह भी नही सकते.....

किसी के प्यार के क़ाबिल नहीं है
मुहब्बत के लिए ये दिल नहीं है...

बड़ा ही ग़मज़दा बे आसरा है
जो कुछ भी हो मगर बुज़दिल नहीं है....

मुहब्बत में बला की चोट खाई
बहुत तड़पा है पर घायल नहीं है....

ये परछाई किसी हरजाई की है
मेरा साया तो ये बिल्कुल नहीं है....

मेरी आँखों से गुमसुम रोशनी है
मेरी नज़रों से वो ओझल नहीं है....

मुझे जो जान से है बढ़ के प्यारा
क्यों मेरे दर्द में शामिल नहीं है....

मुहब्बत चाँद से वो क्या करेगी

चकोरी जैसी जो पागल नहीं है

जो भी मिलता है वो लगता है मुझे हारा हुआ
वक्त के हाथों या फिर हालात का मारा हुआ.....

कौन सुनता है किसी का दर्द इस माहौल मैं
हर किसी की आँख का पानी है अब खारा हुआ.....

शोरोगुल में दब के रह जाती हैं आवाज़ें सभी...
दम घुटा है सोज़ का और साज़ नाकारा हुआ....

दो बदन इक जान थे उड़ते रहे आकाश में
आए जब धरती पे दोनों उनका बँटवारा हुआ.....

रात भर जागा किए बिरहा की काली रात में
आई नींद गहरी जब था उजियारा हुआ......

Thursday, September 18, 2008

मन की मुस्त-ऐ-खाक से बढ़ कर नही हूँ मैं...
लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पे नही हूँ मैं....

इन्सान हूँ धरकते हुए दिल पे हाथ रख...
यूं डूबाके न देख , समंदर नही हूँ मैं.......

चेहरे पे मल रहा हूँ स्याही नसीब की....
आईना हाथ में है..सिकंदर नही हूँ मैं.....

ग़ालिब तेरी जमीं पे लिखी तो है ग़ज़ल....
तेरे कद-ऐ-सुखन के बराबर नही हूँ मैं......

Saturday, September 13, 2008

ए मौत ! उन्हें भुलाये ज़माने गुज़र गए....
आ जा की ज़हर खाए ज़माने गुज़र गए...

ओ जाने वाले आ, की तेरे इंतजार में....
रास्ते को घर बनाये ज़माने गुज़र गए...

गम है ना अब खुशी है, न उम्मीद है न आस ....
सब से निजात पाए ज़माने गुज़र गए....

क्या लायक-ऐ-गम भी नही अब मैं दोस्तों...
पत्थर भी घर में आए ज़माने गुज़र गए....

जाने-बहार फूल नही आदमी हूँ मैं...
आ जा की मुस्कुराये ज़माने गुज़र गए.....

Saturday, September 6, 2008

दिल अकेला है बहुत रेगिस्तान के फूल की तरह...
तुम ने भी छोड़ दिया है मुझे दुनिया की तरह....

छोड़ के न जाओ यूं अहद-ऐ-गुजिस्ता की तरह...
बन के उम्मीद रहो कल के वादे की तरह....

तुम हवा हो तो बीखेरो मुझे साहिल साहिल....
मौज-ऐ-मय हो तो बहा दो मुझे दरिया के तरह....

पास रहते हो तो आता है जुदाई का ख्याल...
तुम मेरे दिल में हो अंदेशा-ऐ-फर्दा की तरह....

बीच में कुछ तो राह-ओ-रस्म-ऐ-ताल्लुकात रखो...
अजनबी यूं नही मिलते है भरोशेमा की तरह....
देख लो ख्वाब मगर ख्वाब का चर्चा न करो...
लोग जल जायेंगे सूरज की तम्मना न करो....

वक्त का क्या है किसी भी पल बदल सकता है...
हो सके तुमसे तो तुम मुझ पे भरोसा न करो...

किरचीयां टूटे हुए अक्स की चुभ जायेंगी ...
और कुछ रोज़ अभी आईना देखा न करो....

अजनबी लगने लगे ख़ुद तुम्हे अपना ही वजूद...
अपने दिन रात को इतना भी अकेला न करो...

ख्वाब बच्चो के खीलौनो की तरह होते है...
ख्वाब देखा न करो , ख्वाब देखा न करो.....

बेखयाली में कभी उँगलियाँ जल जायेंगी...
राख गुज़रे हुए लम्हों की कुरेदा न करो....

मोम के रिश्ते है गर्मी से पिघल जायेंगे....
धुप से सहर में "आजार "ये तमाशा न करो....

----------------कफील आजार------

Wednesday, September 3, 2008

करीब मौत खड़ी है ज़रा ठहर जाओ....
कज़ा से आँख लड़ी है ज़रा ठहर जाओ....

थकी थकी से फजा बुझे बुझे तारे...
बड़ी उदास घड़ी है ज़रा ठहर जाओ...

नही उम्मीद की हम आज सहर देखेंगे...
ये रात हम पे खड़ी है ज़रा ठहर जाओ...

अभी न जाओ की तारो का दिल धड़कता है ...
तमाम रात पड़ी है ज़रा ठहर जाओ...

फ़िर इसके बाद कभी हम तुमको रोकेंगे...
लबो पे साँस रुकी है ज़रा ठहर जाओ....

दम-ऐ-फिराक में जी भर के तुम्हे देख तो लूँ...
ये फैसले की घड़ी है ज़रा ठहर जाओ.....
जो कुछ भी कहो .... कुबूल है तकरार क्यूँ करू.....
शर्मिंदा अब तुम्हे शरेबाज़ार क्यूँ करू.....

मालूम है की पार खुला आसमान है....
छुटते नही ये दरो-दीवार क्या करूँ.....

इस हाल में भी साँस लिया जा रहा हूँ मैं...
जाता नही है आस का आजार क्या करूँ....

फ़िर एक बार ओ रुख -ऐ- मासूम दिखाता....
खुलता नही है ये चस्म-ऐ-गुनाहगार क्या करूँ....

ये पुर सुकून सुबह ये मैं... ये फजा का सरुर...
वो सो रहे है अब उन्हें बेदार क्या करूँ....