Wednesday, December 3, 2008

ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो...
कुछ न कुछ हमने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो...

कू-ए-क़ातिल की बड़ी धूम है चलकर देखें...
क्या ख़बर, कूचा-ए-दिलदार से प्यारा ही न हो...

दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी...
चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो...

कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर...
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो....

ज़िन्दगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको...
दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न ‘हो.....

शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ...
न मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो ...
कुछ बीते लम्हे जब लौट के आते है....
गम के साये साथ में लाते है....

हम जितना भी चाहे आईने के सामने मुस्कुराना....
न जाने आंसू कंहा से आँखों में भर आते है....

अपने दुनिया को आज भी ख्वाबों से सजाते है....
आँखे खुलते ही ये सब भी टूट जाते है....

जानते है न सच होगा अब कोई सपना हमारा....
फ़िर भी आँखों में ओ सुनहरे सपने सजाते है....
रहते है साथ साथ.....मैं और मेरी तन्हाई....
करते है राज़ की बात..... मैं और मेरी तन्हाई.....

दिन तो गुज़र ही जाता है लोगो की भीड़ में....
करते है बसर रात.... मैं और मेरी तन्हाई....

सांसो का क्या भरोसा कब छोड़ जाए साथ....
लेकिन रहेंगे साथ.... मैं और मेरी तन्हाई.....

आए न तुम्हे याद कभी भूल कर भी हम...
करते है तुम्हे याद.... मैं और मेरी तन्हाई.....

आ के पास क्यूँ दूर हो गए हमसे....
करते है तेरी तलाश.... मैं और मेरी तन्हाई....

कल रात जाने क्या हुआ....

कुछ देर पहले नींद से....

कुछ अश्क मिलने आ गए....

कुछ ख्वाब भी टूटे हुए....

कुछ लोग भी रूठे हुए...

कुछ रास्ता भटकी हुई...

कुछ गर्द में लिपटी हुई ...

कुछ बेतरह फ़ैली हुई...

कुछ खोल में लिपटी हुई....

बे-रब्त सी सोचे कई...

भूली हुई बातें कई...

एक शख्स की यादें कई...

फ़िर देर तक जागा रहा....

सोच में गुम बैठा रहा....

ऊँगली से ठंढे फर्श पर...

एक नाम ही लिखता रहा....

कल रात भी ओ रात थी...

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मैं देर तक रोता रहा......

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कल रात जाने क्या हुआ.................................................