मन की मुस्त-ऐ-खाक से बढ़ कर नही हूँ मैं...
लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पे नही हूँ मैं....
इन्सान हूँ धरकते हुए दिल पे हाथ रख...
यूं डूबाके न देख , समंदर नही हूँ मैं.......
चेहरे पे मल रहा हूँ स्याही नसीब की....
आईना हाथ में है..सिकंदर नही हूँ मैं.....
ग़ालिब तेरी जमीं पे लिखी तो है ग़ज़ल....
तेरे कद-ऐ-सुखन के बराबर नही हूँ मैं......
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