Saturday, September 6, 2008

देख लो ख्वाब मगर ख्वाब का चर्चा न करो...
लोग जल जायेंगे सूरज की तम्मना न करो....

वक्त का क्या है किसी भी पल बदल सकता है...
हो सके तुमसे तो तुम मुझ पे भरोसा न करो...

किरचीयां टूटे हुए अक्स की चुभ जायेंगी ...
और कुछ रोज़ अभी आईना देखा न करो....

अजनबी लगने लगे ख़ुद तुम्हे अपना ही वजूद...
अपने दिन रात को इतना भी अकेला न करो...

ख्वाब बच्चो के खीलौनो की तरह होते है...
ख्वाब देखा न करो , ख्वाब देखा न करो.....

बेखयाली में कभी उँगलियाँ जल जायेंगी...
राख गुज़रे हुए लम्हों की कुरेदा न करो....

मोम के रिश्ते है गर्मी से पिघल जायेंगे....
धुप से सहर में "आजार "ये तमाशा न करो....

----------------कफील आजार------

2 comments:

संगीता पुरी said...

मोम के रिश्ते है गर्मी से पिघल जायेंगे....
धुप से सहर में "आजार "ये तमाशा न करो....
बहुत अच्छा।

Unknown said...

वक्त का क्या है किसी भी पल बदल सकता है...
हो सके तुमसे तो तुम मुझ पे भरोसा न करो...

किरचीयां टूटे हुए अक्स की चुभ जायेंगी ...
और कुछ रोज़ अभी आईना देखा न करो....

वाह बेहतरीन ग़ज़ल ..