Saturday, August 30, 2008
Wednesday, August 20, 2008
हम अपने दर्द को ग़ज़लों में ढाल देते हैं
हमारी नींदों में अक्सर जो डालती हैं ख़लल
हम ऐसी बातों को दिल से निकाल देते हैं
हमारे कल की ख़ुदा जाने शक़्ल क्या होगी
हर एक बात को हम कल पे टाल देते हैं
कहीं दिखे ही नहीं गाँवों में वो पेड़ हमे
बुज़ुर्ग साये की जिनके मिसाल देते हैं
कमाल ये है वो गोहरशनास हैं ही नहीं
जो इक नज़र में समंदर खंगाल देते है
वो सारे हादसे हिम्मत बढ़ा गए मेरी
कि जिनके साये ही दम—ख़म पिघाल देते हैं
ज़िन्दगी के नाम पर धिक्कार हो जाते हैं लोग
सत्य और ईमान के हिस्से में हैं गुमनामियाँ
साज़िशें बुन कर मगर अवतार हो जाते हैं लोग
बेच देते हैं सरे—बाज़ार वो जिस्मो—ज़मीर
भूख से जब भी कभी लाचार हो जाते हैं लोग
रात भर मशगूल रहते हैं अँधेरों में कहीं
और अगली सुबह का अखबार हो जाते हैं लोग
फिर कबीलों का न जाने हश्र क्या होगा, जहाँ
नोंक पर बंदूक की सरदार हो जाते हैं लोग
मतलबों की भीड़ जब—जब कुलबुलाती है यहाँ
हमने देखा है बड़े मक़्क़ार हो जाते हैं लोग
साहिलों पर बैठ तन्हा भला क्या इन्तज़ार
आज हैं इस पार कल उस पार हो जाते हैं लोग
कि जब ज़मीर मुझे रास्ता दिखाता था
मशीन बन तो चुका हूँ मगर नहीं भूला
कि मेरे जिस्म में दिल भी कभी धड़कता था
वो बच्चा खो गया दुनिया की भीड़ में कब का
हसीन ख़्वाबों की जो तितलियाँ पकड़ता था
मेरा वजूद भी शामिल था उसकी मिट्टी में
मेरा भी खेत की फ़स्लों में कोई हिस्सा था
हमारी ज़िन्दगी थी इक तलाश पानी की
जहान रेत का इक चमकता दरिया था
साया दिवार पे मेरा था, सदा किसकी थी...........
उसकी रफ्तार से लिपटी रही मेरी आँखे,
उस ने मुड़ कर भी न देखा की वफ़ा किसकी थी...
वक्त के तरह दबे पाँव ये कौन आया है,
मैंने अँधेरा जिसे समझा , ओ कबा किसकी थी...
आंसू से ही सही भर गया दामन मेरा,
हाथ तो मैंने उठाये थे,दुआ किसकी थी..........
मेरे आहों की जबान कोई समझता कैसे,
जिंदगी इतनी दुखी मेरे सिवा किसकी थी......
आग से दोस्ती उसकी थी, जला घर मेरा,
दी गयी किसको सज़ा और खता किसकी थी......
Monday, August 18, 2008
हमको खुश रहने के आदाब कंहा आते है....
मैं तो एकमुश्त उसे सौंप दू सब कुछ लेकिन,
एक मुट्ठी में मेरे ख्वाब कंहा आते है.....
मुद्दतो बाद तुम्हे देख के दिल भर आया,
वरना शहरो में सैलाब कंहा आते है.....
मेरी बेदार निगाहों में कंही भूले से,
नींद आए भी तो अब खवाब कंहा आते है.....
शिद्दते दर्द है या कसरत -ऐ-मैनोशी है,
होश में तेरे ये बेताब कंहा आते है....
हम किसी तरह तेरे दरवाज़े पे ठिकाना कर ले,
हम फकीरों को ये आदाब कंहा आते है.....
सर बसर जिन में फकत तेरी झलक मिलती थी,
अब मयस्सर हमें ओ खवाब कंहा आते है......
Sunday, August 17, 2008
ज़िन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नही...
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नही....
मेरे इन हाथो की चाहो तो तलाशी ले लो...
मेरे हाथो में लकीरों के सिवा कुछ भी नही...
हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यंहा.....
सामने जिनके ओ सचमुच का खुदा कुछ भी नही....
या खुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार....
ज़र्द ही ज़र्द है पेरो पे, हरा कुछ भी नही....
दिल भी जिद पे अडा है , किसी बच्चे की तरह...
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए , या कुछ भी नही....
जिंदगी, जैसी तम्मना थी , नही, कुछ कम है....
हर घड़ी होता है एहसास , कंही कुछ कम है...
घर की तामीर तस्सबुर में ही हो सकती है ...
अपने नक्से के मुताबिक ये ज़मीं कुछ कम है...
बिछडे लोगो से मुलाकात कभी फ़िर होगी...
दिल में उम्मीद तो काफी है , यकीं कम है....
अब जिधर देखीये लगता है की इस दुनिया में...
कंही कुछ चीज़ जियादा है , कंही कुछ कम है....
आज भी तेरी दुरी ही है उदासी का सबब....
ये अलग बात है की पहले से नही, अब कुछ कम है.....
Friday, August 15, 2008
रोग-सा इक ज़िंदगी को हो गया है।
अर्थ कुछ रखता नहीं तुम बिन ये जीवन,
फूल चुन कर कोई काँटे बो गया है।
आँख से टपका नहीं है कोई आँसू,
मन हज़ारों बार लेकिन रो गया है।
जाने कबसे मैं पुकारे जा रहा हूँ,
भाग्य मेरा लग रहा है सो गया है।
सभी चेहरे अपरिचित लगने लगे हैं,
शहर सारा अजनबी-सा हो गया है।
आस्माँ भी है शरीक़े-ग़म मेरा ,
आज धरती को बरस कर धो गया है।
तुम नज़र से दूर हो कुछ खो गया है,
रोग-सा इक ज़िंदगी को हो गया है।
Monday, August 11, 2008
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है...
एक चिंगारी कंही से ढूंढ लाओ दोस्तों...
इस दिए में तेल से भींगी हुई बाती तो है...
एक खंडहर के ह्रदय सी, एक जंगली फूल सी....
आदमी के पीर गूंगी ही सही गाती तो है....
एक चादर रात ने सारे नगर पे ड़ाल दी ...
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है...
निर्वचन मैदान में लेटी हुई जो नदी है...
पत्थरो के ओट में , जा जा के बतियाती तो है...
दुःख नहीं कोई के अब उपलब्धियों के नाम पर...
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है....
Sunday, August 3, 2008
बहुत कड़ा है सफ़र... थोडी दूर साथ चलो.....
तमाम उम्र कंहा कोई साथ देता है....
मैं जनता हूँ मगर थोडी दूर साथ चलो.....
नशे में चूर हूं मैं भी... तुम्हे भी होश नहीं....
बडा मज़ा हो थोडी दूर गर साथ चलो....
अभी तो जाग रहे है चिराग राहों के....
अभी तो दूर है सहर .... थोडी दूर साथ चलो.....