नहीं मिलना तो भला याद भी आते क्यों हो...
इस कमी का मुझे अहसास दिलाते क्यों हो...
डरतुम्हें इतना भी क्या है कहो ज़माने का ...
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यों हो...
दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आएगा...
आप पलकों को गलीचे-सा बिछाते क्यों हो....
हम इतने किए उपकार सदा ये माना....
हम को हर बार मगर आप गिनाते क्यों हो....
जाने किस वक्त तुम्हें इनकी ज़रूरत होगी....
आप बेवक्त ही अश्कों को गिराते क्यों हो....
यारी पिंजरे से ही कर ली है जब परिंदे ने...
आश्मान उसको खुला आप दिखाते क्यों हो...
जिंदगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर...
आग तुम इश्क की सरकार लगाते क्यों हो....
मुझको मालूम है दुश्मन नहीं हो दोस्त मेरे....
मुझसे खंजर को बिना बात छिपाते क्यों हो...
इश्क मरता नहीं यारों ये हकीकत जानो....
किसी मीरा को ज़हर आप पिलाते क्यों हो....
Friday, February 27, 2009
कहने को तो हम, खुश अब भी हैं...
हम तुम्हारे तब भी थे, हम तुम्हारे अब भी हैं....
रूठने-मनाने के इस खेल में, हार गए हैं हम....
हम तो रूठे तब ही थे, आप तो रूठे अब भी हैं....
मेरी ख़ता बस इतनी है, तुम्हारा साथ चाहता हूँ...
तब तो पास होके दूर थे, और दूरियाँ अब भी हैं...
मुझसे रूठ के दूर हो, पर एहसास तो करो...
प्यासे हम तब भी थे, प्यासे हम अब भी हैं....
इस इंतज़ार में मेरा क्या होगा, तुम फिक्र मत करना .....
सुकून से हम तब भी थे, सुकून से हम अब भी हैं.......
बस थोड़ा रूठने के अंजाम से डरते हैं....
डरते हम तब भी थे, डरते हम अब भी हैं.......
हमारी तमन्ना कुछ ज़्यादा नहीं थी, जो पूरी न होती....
कम में गुज़ारा तब भी था, कम में गुज़ारते अब भी हैं....
चलते हैं तीर दिल पे कितने, जब तुम रूठ जाते हो....
ज़ख्मी हम तब भी थे, ज़ख्मी हम अब भी हैं....
मेरी मासूमियत को तुम, ख़ता समझ बैठे हो...
मासूम हम तब भी थे, मासूम हम अब भी हैं....
आप हमसे रूठा न करें, बस यही इल्तिजा है....
फरियादी हम तब भी थे, फ़रियादी हम अब भी हैं.....
तुम हो किस हाल में, कम से कम ये तो बता दो....
बेखबर हम तब भी थे, बेखब़र हम अब भी हैं
हम तुम्हारे तब भी थे, हम तुम्हारे अब भी हैं....
रूठने-मनाने के इस खेल में, हार गए हैं हम....
हम तो रूठे तब ही थे, आप तो रूठे अब भी हैं....
मेरी ख़ता बस इतनी है, तुम्हारा साथ चाहता हूँ...
तब तो पास होके दूर थे, और दूरियाँ अब भी हैं...
मुझसे रूठ के दूर हो, पर एहसास तो करो...
प्यासे हम तब भी थे, प्यासे हम अब भी हैं....
इस इंतज़ार में मेरा क्या होगा, तुम फिक्र मत करना .....
सुकून से हम तब भी थे, सुकून से हम अब भी हैं.......
बस थोड़ा रूठने के अंजाम से डरते हैं....
डरते हम तब भी थे, डरते हम अब भी हैं.......
हमारी तमन्ना कुछ ज़्यादा नहीं थी, जो पूरी न होती....
कम में गुज़ारा तब भी था, कम में गुज़ारते अब भी हैं....
चलते हैं तीर दिल पे कितने, जब तुम रूठ जाते हो....
ज़ख्मी हम तब भी थे, ज़ख्मी हम अब भी हैं....
मेरी मासूमियत को तुम, ख़ता समझ बैठे हो...
मासूम हम तब भी थे, मासूम हम अब भी हैं....
आप हमसे रूठा न करें, बस यही इल्तिजा है....
फरियादी हम तब भी थे, फ़रियादी हम अब भी हैं.....
तुम हो किस हाल में, कम से कम ये तो बता दो....
बेखबर हम तब भी थे, बेखब़र हम अब भी हैं
ज़िन्दगी और मौत में बस, फासला इतना रहे....
दरमियाँ दोनों के तेरे प्यार का परदा रहे............
सोचता हूँ रात दिन की चंद लम्हों के लिए....
तू रहे और मैं रंहू...ऐसी कोई दुनिया रहे....
सारी नेमत बेच कर के मांग लो तकदीर से ...
सुबह को मर जायें लेकिन रात भर जिन्दा रहें....
क्या करूँगा खुशी ले कर, पास रखो तुम इससे....
पर तुम्हारे गम में साथी, मेरा कुछ हिस्सा रहे....
साथ दे देता मुकद्दर और ऐसा हो सके......
जब किसी महफ़िल में जाऊँ, ओ वंहा आया रहे........
दरमियाँ दोनों के तेरे प्यार का परदा रहे............
सोचता हूँ रात दिन की चंद लम्हों के लिए....
तू रहे और मैं रंहू...ऐसी कोई दुनिया रहे....
सारी नेमत बेच कर के मांग लो तकदीर से ...
सुबह को मर जायें लेकिन रात भर जिन्दा रहें....
क्या करूँगा खुशी ले कर, पास रखो तुम इससे....
पर तुम्हारे गम में साथी, मेरा कुछ हिस्सा रहे....
साथ दे देता मुकद्दर और ऐसा हो सके......
जब किसी महफ़िल में जाऊँ, ओ वंहा आया रहे........
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