Monday, October 31, 2011

दिल ने तन्हाई के लम्हात चुगे थे दिन भर
और आँखों में मेरी अश्क छुपे थे दिन भर

मौलवी थे वो तपस्या में रहे थे दिन भर
उनकी चौखट पे कई लोग रुके थे दिन भर

प्यार इस शहर में इक शख्स था कल बाँट रहा
उस के क़दमों में बहुत लोग गिरे थे दिन भर

शब की आगोश में बेसुध से पड़े जिस लम्हा
सिर्फ इस बात पे खुश थे कि चले थे दिन भर

कोई सीने से लगा और कोई बेगानावार
थी तसल्ली कि कुछ अफराद मिले थे दिन भर

जश्न तो आया मगर दिल को दरीदः कर के
सब इसी बात पे अफ़सोस किये थे दिन भर

उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर

हम सुखनवर तो नहीं थे कोई ग़ालिब जैसे
बस खयालात ही कागज़ पे लिखे थे दिन भर

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