Friday, February 27, 2009

कहने को तो हम, खुश अब भी हैं...
हम तुम्हारे तब भी थे, हम तुम्हारे अब भी हैं....

रूठने-मनाने के इस खेल में, हार गए हैं हम....
हम तो रूठे तब ही थे, आप तो रूठे अब भी हैं....

मेरी ख़ता बस इतनी है, तुम्हारा साथ चाहता हूँ...
तब तो पास होके दूर थे, और दूरियाँ अब भी हैं...

मुझसे रूठ के दूर हो, पर एहसास तो करो...
प्यासे हम तब भी थे, प्यासे हम अब भी हैं....

इस इंतज़ार में मेरा क्या होगा, तुम फिक्र मत करना .....
सुकून से हम तब भी थे, सुकून से हम अब भी हैं.......

बस थोड़ा रूठने के अंजाम से डरते हैं....
डरते हम तब भी थे, डरते हम अब भी हैं.......

हमारी तमन्ना कुछ ज़्यादा नहीं थी, जो पूरी न होती....
कम में गुज़ारा तब भी था, कम में गुज़ारते अब भी हैं....

चलते हैं तीर दिल पे कितने, जब तुम रूठ जाते हो....
ज़ख्मी हम तब भी थे, ज़ख्मी हम अब भी हैं....

मेरी मासूमियत को तुम, ख़ता समझ बैठे हो...
मासूम हम तब भी थे, मासूम हम अब भी हैं....

आप हमसे रूठा न करें, बस यही इल्तिजा है....
फरियादी हम तब भी थे, फ़रियादी हम अब भी हैं.....

तुम हो किस हाल में, कम से कम ये तो बता दो....
बेखबर हम तब भी थे, बेखब़र हम अब भी हैं

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