ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो...
कुछ न कुछ हमने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो...
कू-ए-क़ातिल की बड़ी धूम है चलकर देखें...
क्या ख़बर, कूचा-ए-दिलदार से प्यारा ही न हो...
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी...
चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो...
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर...
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो....
ज़िन्दगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको...
दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न ‘हो.....
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ...
न मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो ...
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1 comment:
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ...
न मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो ...
बहुत अच्छी गलत। यर्थाथवादी शेर
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