ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझसे मुकरने लगा हूँ मैं...
मुझको सँभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं...
पहले हक़ीक़तों ही से मतलब था, और अब...
एक-आध बात फ़र्ज़ भी करने लगा हूँ मैं...
हर आन टूटते ये अक़ीदों के सिलसिले...
लगता है जैसे आज बिखरने लगा हूँ मैं...
ऐ चश्म-ए-यार ! मेरा सुधरना मुहाल था...
तेरा कमाल है कि सुधरने लगा हूँ मैं...
ये मेहर-ओ-माह, अर्ज़-ओ-समा मुझमें खो गये...
इक कायनात बन के उभरने लगा हूँ मैं...
इतनों का प्यार मुझसे सँभाला न जायेग...
लोगो ! तुम्हारे प्यार से डरने लगा हूँ मैं...
दिल्ली ! कहाँ गयीं तिरे कूचों की रौनक़ें...
गलियों से सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं ...
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