Sunday, October 12, 2008

ये अलग बात है साकी की मुझे होश नही...
होश इतना है की मैं तुझसे फरामोश नही...

मैं तेरी मस्त निगाहों का भरम रख लूंगा...
होश आया भी तो कह दूंगा मुझे होश नही....

याद इतना है की पंहुचा दर - ऐ-मैखाने तक...
क्या कहू आगे की आगे का मुझे होश नही.....

कभी उन मदभरी आँखों से पिया था इक जाम...
अज तक होश नही, होश नही, होश नही..........

1 comment:

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढिया गजल है।बधाई।

याद इतना है की पंहुचा दर - ऐ-मैखाने तक...
क्या कहू आगे की आगे का मुझे होश नही.....