Monday, August 18, 2008

तू बता ऐ दिल-ऐ- बेताब कंहा आते है,
हमको खुश रहने के आदाब कंहा आते है....

मैं तो एकमुश्त उसे सौंप दू सब कुछ लेकिन,
एक मुट्ठी में मेरे ख्वाब कंहा आते है.....

मुद्दतो बाद तुम्हे देख के दिल भर आया,
वरना शहरो में सैलाब कंहा आते है.....

मेरी बेदार निगाहों में कंही भूले से,
नींद आए भी तो अब खवाब कंहा आते है.....

शिद्दते दर्द है या कसरत -ऐ-मैनोशी है,
होश में तेरे ये बेताब कंहा आते है....

हम किसी तरह तेरे दरवाज़े पे ठिकाना कर ले,
हम फकीरों को ये आदाब कंहा आते है.....

सर बसर जिन में फकत तेरी झलक मिलती थी,
अब मयस्सर हमें ओ खवाब कंहा आते है......

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