Monday, August 11, 2008

इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है...
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है...

एक चिंगारी कंही से ढूंढ लाओ दोस्तों...
इस दिए में तेल से भींगी हुई बाती तो है...

एक खंडहर के ह्रदय सी, एक जंगली फूल सी....
आदमी के पीर गूंगी ही सही गाती तो है....

एक चादर रात ने सारे नगर पे ड़ाल दी ...
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है...

निर्वचन मैदान में लेटी हुई जो नदी है...
पत्थरो के ओट में , जा जा के बतियाती तो है...

दुःख नहीं कोई के अब उपलब्धियों के नाम पर...
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है....

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