तुम नज़र से दूर हो कुछ खो गया है।
रोग-सा इक ज़िंदगी को हो गया है।
अर्थ कुछ रखता नहीं तुम बिन ये जीवन,
फूल चुन कर कोई काँटे बो गया है।
आँख से टपका नहीं है कोई आँसू,
मन हज़ारों बार लेकिन रो गया है।
जाने कबसे मैं पुकारे जा रहा हूँ,
भाग्य मेरा लग रहा है सो गया है।
सभी चेहरे अपरिचित लगने लगे हैं,
शहर सारा अजनबी-सा हो गया है।
आस्माँ भी है शरीक़े-ग़म मेरा ,
आज धरती को बरस कर धो गया है।
तुम नज़र से दूर हो कुछ खो गया है,
रोग-सा इक ज़िंदगी को हो गया है।
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आस्माँ भी है शरीक़े-ग़म मेरा ,
आज धरती को बरस कर धो गया है।
तुम नज़र से दूर हो कुछ खो गया है,
रोग-सा इक ज़िंदगी को हो गया है।
बहुत ही अच्छा लिखा है हुज़ूर ...शुक्रिया ..
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