Tuesday, July 22, 2008

ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया...
जाने क्यों तेरे अंजाम पे रोना आया....

यू तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती है...
आज कुछ बात है जो इस शाम पे रोना आया...

कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंजिल -ऐ- इश्क पे हर गम पे रोना आया....

जब हुआ ज़माने में जिक्र मुहब्बत का "शकील"
मुझे को अपने दिल-ऐ-नाकाम पे रोना आया....

----शकील बदायुनी

No comments: