Tuesday, April 8, 2008

आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे.....
मेरे अपने मेरे होने की निशानी मांगे...
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे.....

मैं भटकता ही रहा....दर्द के वीराने में....
वक़्त लिखता रहा...
चेहरे पे हर इक पल का हिसाब...

मेरी शोहरत मेरी दीवानगी की नज़र हुई ....
पी गयी मय की बोतल ... मेरे गीतों की किताब...
आज लौटा हूं तो हँसने की अदा भूल गया...
ये शहर भुला मुझे मैं भी इसे भूल गया....

मेरी अपने मेरे होने की निशानी मांगे...
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे.....

मेरा फन फिर मुझे बाज़ार में ले आया है...
ये ओ जाँ है की जंहा माहरो वफ़ा बिकते है...
बाप बिकते है और लखत-ए-जिगर बिकते है...
कोख बिकती है दिल बिकते है सिर बिकते है...

इस बदलती दुनिया का खुदा कोई नहीं....
सस्ते दामो में हर रोज़ खुदा बिकते है....बिकते है...

मेरी अपने मेरे होने की निशानी मांगे...
आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे.....

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