जिंदगी ने कर लिया स्वीकार अब तो पथ यही है.
अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है
एक हल्का सा धुंधलका था, कंही कम हो चला है.
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करू आकाश की मनुहार .......
अब तो पथ यही है ....
क्या भरोसा कांच का घाट है, किसी दिन फूट जाये .
एक मामूली कहानी है अधूरी छूट जाये,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाये .
आज हर नक्षत्र है अनुदार ,
अब तो पथ यही है .......
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है.
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढी है,
यह पहाडी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढी है ,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है.........
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